महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार
महिला बाल विकास

सफलता की कहानियां

14 सदस्यों वाला मरकरी स्वयं सहायता समूह, बुनियादाबाद 21.9.2010 को युवाशक्ति द्वारा प्रोत्साहित किया गया। समूह ने अपनी मासिक बैठकों में बचत इकट्ठा करना प्रारम्भ किया और इस बचत को एएनएससी बैंक लिमिटेड, हड्डो में स्थित बचत बैंक खाते में जमा किया। इसके बाद उन्होंने आपस में ही उधार देना शुरू किया और धनराशि बढ़ाकर रु०36,400/- तक कर दिया। युवाशक्ति ने एएनएससी बैंक के साथ 18/02/2011 तक रु०25,000 तक ऋण लिंकेज की व्यवस्था कर ली और मरकरी ने सफलतापूर्वक ऋण को पूरा कर लिया है। अब समूह ने व्यक्तिगत आय सृजन में प्रवेश करने के लिए ऋण हेतु युवाशक्ति को सम्पर्क किया। पर्याप्त मूल्यांकन करने के बाद 26/06/2011को रु०2,00,000/- की राशि मंज़ूर की गई। इस ऋण सुविधा में से श्रीमती चित्रा रवि द्वारा रु०25,000/- की राशि प्राप्त की गई जिसे उन्होंने अपने व्यापार (फैंसी स्टोर्स) में निवेश किया। उन्होंने फैंसी वस्तुएं और स्कूल स्टेशनरी आदि खरीदी। इससे पूर्व उन्होंने यह दुकान बैंक से ऋण लेकर ली थी। अब वे हर महीने रु०40,000/- का कारोबार कर रही हैं और रु०4,000/-से रु०5,000/- तक मासिक अर्जित कर रही हैं। वे ऋण राशि समय पर वापस कर रही हैं। उनके बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ रहे हैं और वे अपने परिवार की ज़रूरतों के लिए पति पर निर्भर नही हैं। उन्होंने आरएमके ऋण सहायता के लिए युवाशक्ति का आभार प्रकट किया है, जिसकी वजह से वे वह बन सकीं जो आज वे हैं।

  • श्रीमती झाँसी लक्ष्मी पत्नी श्री बी गुरुवामन्दड़ि राष्ट्रीय सेवा समिति (आरएएसएस) द्वारा प्रायोजित बालाजी संघम दासरीमातम स्वयं सहायता समूह सदस्यों में से एक हैं। उन्हें आम-अदरक, आम-आवकाय, नीम्बू, अदरक, लहसुन के साथ अदरक, लहसुन विना अदरक, प्याज, लाल मिर्च, करेला, आमला, पुदीना, टमाटर, अंबाडी, अंबाडी विना लहसुन आदि का अचार बनाने में उचित प्रशिक्षण दिया गया था। यह व्यापार अच्छा परिणाम दिखा रहा है और महिला इन उत्पादों से अच्छी आमदनी कमा रही हैं। इस लाभ से उनका जीवन सुखमय बन गया है। समाज में उनकी इज़्ज़त बढ़ी है। कुछ सुधार के बाद वे अपना व्यापार और बढ़ाना चाहती हैं। उनका व्यापार उस क्षेत्र की अन्य महिलाओं को स्वयं सहायता समूह बनाने और सामूहिक रूप से कुछ व्यापार करने के लिए आकर्षित कर रहा है। यह काम आरएएसएस के माध्यम से आरएमके से प्राप्त सूक्ष्म ऋण सहायता से संभव हुआ है।
  • श्रीमती एन शिव पार्वती तिरुमलेस्वर संघम की सदस्य हैं, जिसमें 14 ग्रुप सदस्य हैं। समूह में आने से पहले वे एक फोटो फ्रेम की दुकान में काम करती थीं और बहुत कम पैसा कमा पाती थीं जिससे मुश्किल से उनकी ज़रूरतें पूरी हो पाती थी। समूह में आने के बाद उन्होंने ग्रुप प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण ने उन्हें अपना व्यापार शुरू करने की प्रेरणा दी। उन्हें एनजीओ- आरएएसएस के माध्यम से आरएमके से सूक्ष्म ऋण सहायता मिली। कठिन परिश्रम से उन्होंने अपना व्यापार बढ़ाया, जिससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी प्राप्त हुई। उनका व्यापार अत्यंत आकर्षक और लाभदायक है। बाद में उनके पति भी उनके साथ जुड़ गए। एक नगण्य आमदनी से आज पति-पत्नी लगभग रु०8000/- प्रति माह कमा रहे हैं। इससे उनका जीवन स्तर ऊंचा हो गया है और समाज में उनकी इज़्ज़त बढ़ गई है। उनके जीवन में यह परिवर्तन एनजीओ के प्रयासों और आरएमके के सूक्ष्म (अल्प) ऋण कार्यक्रम की वजह से सम्भव हुआ।
  • श्री एम समसिव राव की पत्नी श्रीमती मुंथा संथा एक खेतिहर मज़दूर हैं और वे एक बहुत गरीब परिवार की हैं। बहुत कम आमदनी के कारण उनके परिवार को अच्छी ज़िन्दगी चलाने में बहुत कठिनाई होती थी। तब उन्हें ग्रामश्री नामक स्थानीय एनजीओ द्वारा बनाये गए एसएचजी के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने एसएचजी ज्वाइन किया और उन्हें छोटा सा कामधंधा शुरू करने के लिए एनजीओ के माध्यम से आरएमके से अल्प ऋण सहायता मिली। उन्होंने सब्ज़ी बेचने की छोटी सी दुकान शुरू की। व्यापार में उन्हें अच्छा फायदा हुआ और उन्होंने एक अच्छी दुकान ले ली। सब्ज़ी की दुकान से हुई आमदनी से उनकी आर्थिक हालत अच्छी हो गई। अब वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे सकती हैं। अल्प ऋण सहायता ने श्रीमती मुंथा संथा को अच्छी ज़िन्दगी, मान सम्मान और आत्म सम्मान से जीवन जीने के काबिल बनाया। अब श्रीमती मुंथा संथा चाहती हैं कि वे एक अच्छा सा घर बनाएं और सुख से ज़िन्दगी बिताएं। श्रीमती मुंथा संथा कहती हैं कि यदि ग्रामश्री एनजीओ और वित्तीय सहायता न होती तो यह सब सम्भव नहीं हो पाता।
  • श्रीमती राजकनी एक विधवा हैं और बहुत गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उन्होंने अपने गांव की दूसरी महिलाओं के साथ मिलकर एक एसएचजी बनाया जिसे एड इंडिया द्वारा इसके ग्रास रुट एनजीओ के माध्यम से प्रायोजित किया गया था। एसएचजी के अन्य सदस्यों की प्रगति से प्रभावित होकर उन्होंने भी सदस्य बनने की सोची और डेरी व्यापार में कदम रखना चाहा। इसके लिए वे गायें खरीदना चाहती थीं जिसके लिए पैसे की ज़रूरत थी। उन्होंने आरएमके से ऋण सहायता के लिए एड इंडिया से संपर्क किया। आरएमके से ऋण सहायता मिलने के बाद उन्होंने दो दुधारू गायें खरीदीं और सफलतापूर्वक दूध बेचना शुरू किया। इस बिक्री से उन्हें रोज़ रु०100/- का फायदा होने लगा। इस आमदनी से वे आत्मनिर्भर हो सकीं। इससे वे अपने समुदाय में मान सम्मान और प्रतिष्ठा की ज़िन्दगी जीने लगीं। अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए उन्होंने उन्हें अच्छे स्कूलों में दाखिल कराया। आर्थिक रूप से उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में मदद करने के लिए वे आरएमके की बड़ी सराहना करती हैं।
  • बिहार के हजारीबाग ज़िले में स्थित एक स्थानीय एनजीओ - जन जागरण केंद्र, किरन बचत समिति सहित आरएमके से सूक्ष्म (अल्प) ऋण प्रदान कराके अपने एसएचजी सदस्यों की सहायता करता है। किरन बचत समिति (एसएचजी) हजारीबाग ज़िले में स्थित बरही पंचायत समिति के सिंदपुर नामक गांव की 20 महिलाओं का एक समूह है। समिति के सदस्यों को अपनी मासिक आमदनी बढ़ाने के लिए समिति से गाय बकरियां आदि पशु खरीदने के लिए ऋण मिलता है। लेकिन एक सदस्य श्रीमती गीता देवी के दिमाग में कोई और योजना थी। उन्होंने साईकिल रिपेयर की दुकान खोलने के लिए एनजीओ के माध्यम से आरएमके से अल्प ऋण सहायता के लिए आवेदन किया। उन्हें इस ट्रेड में सफलता मिली। श्रीमती गीता को उनके परिवार में बड़ी आर्थिक हैसियत मिली। उन्हें परिवार में नीति निर्णयन प्रक्रिया में काफी महत्व दिया जाता है। अल्प ऋण सहायता से उन्हें आत्म सम्मान और प्रतिष्ठा की ज़िन्दगी जीने में मदद मिली है । श्रीमती गीता के विचार में उनकी सफलता का श्रेय आरएमके और एनजीओ जन जागरण केंद्र को जाता है जिनकी मदद के विना ये सब सम्भव नही हो पाता ।
  • श्रीमती शीला देवी, जो अनुसूचित जाति परिवार की एक सदस्य हैं, बिहार के वैशाली ज़िले के ग्रामीण क्षेत्र में पटवा टोली में रहती हैं। उनके पति खेतिहर मज़दूर हैं और उनका घर कठिनाई से चलता है। चूंकि उनके पति की आमदनी सामयिक होती थी, परिवार बड़ी गरीबी में गुज़र बसर करता था।

प्रगति सुधार और शिक्षा हेतु एकीकृत राष्ट्रीय विकास केंद्र (आईएनडीसीएआरई), जो कि दिल्ली का एक एनजीओ है, आरएमके से वित्तीय सहायता प्राप्त करने के बाद सफलतापूर्वक शहर के विभिन्न हिस्सों में शहरी झोपड़पट्टियों और ग्रामीण गरीब महिलाओं के साथ उनका जीवन स्तर सुधारने और अच्छी ज़िन्दगी प्रदान करने के लिए काम कर रहा है। आईएनडीसीएआरई ऐसे एसएचजीज़, को-ऑपरेटिव्स, महिला चेतना मंच, जो गरीब महिलाओं के तत्काल सामाजिक और आर्थिक बुनियादी ज़रूरतों पर ध्यान देने के लिए महत्वपूर्ण संगठन हैं, को प्रोत्साहित करता है। आईएनडीसीएआरई ने 1,600 एसएचजीज़ और लगभग 50,000 महिलाओं को गठित किया है। दिल्ली में यह संगठन एमसीडी और दिल्ली प्रशासन की मदद से 164 सरकारी प्राइमरी स्कूलों के1,00,000 बच्चों के लिए मध्यान्ह भोजन योजना क्रियान्वित कर रहा है।
एसएचजी सदस्यों को इस प्रकार सुविधा दी गई है कि वे कार्यक्रम के प्रबन्धन भाग में सीधे शामिल हो सकें। इस कार्यक्रम में इस समय 1500 महिलाएं संलग्न हैं। आईएनडीसीएआरई उनकी तकनीकी एवं सामाजिक क्षमताओं और कार्य शैली को बढ़ाने के लिए उन्हें व्यावसायिक दक्षता विकास और प्रशिक्षण दे रहा है। अग्रगामी परियोजना (पायलट प्रोजेक्ट) बहुत सफलतापूर्वक काम कर रहा है। इसमें निम्नलिखित शामिल हैं :-

  • पूर्वी सिंहभूमि ज़िले के पोटका ब्लॉक में दामुढि गांव की श्रीमती शुभद्रा महतो की शादी बहुत कम उम्र में हो गई थी। वे सिर्फ छठवी कक्षा तक पढ़ सकीं परन्तु उनके सपने बहुत बड़े थे। वे हमेशा सोचती थीं कि कैसे मैं अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हूँ। क्या मैं कभी आत्मनिर्भर हो सकती हूँ? परन्तु इतनी सी पढ़ाई लिखाई के चलते वे यह कैसे कर सकती थीं।

    दूसरी ओर श्रीमती सुभद्रा के पति एक ठेकेदार के पास मज़दूर का काम करते थे। इन दोनों के पास जीवन यापन के लिए खेती लायक पर्याप्त ज़मीन भी नही थीं। इसलिए परिवार में संकट था, क्योंकि दिन प्रतिदिन के खर्च का भी प्रबंध नहीं हो पा रहा था। यह स्थिति बाढ़ और सूखे के दौरान और भी कठिन हो जाती थी। अचानक एक दुर्घटना में उनके पति के पैर में चोट लग गई। परिणामस्वरूप, उनकी प्रतिदिन की आमदनी रु०380/ से घटकर रु०250/- रह गई। उनकी स्थिति बदतर हो गई। उनको दाल रोटी के भी लाले पड़ गए।

    एसएचजी ज्वाइन करने के बाद ही उनके सभी प्रश्नों और समस्याओं के समाधान की उम्मीद जग गई। उन्हें एहसास हुआ कि वे अकेले नहीं हैं। समूह में और भी महिलाएं हैं, जो उनकी मदद करेंगी।

    एनजीओ के प्रतिनिधि ने उन्हें बताया कि वे आकस्मिक ज़रूरतों- जैसे घर की मरम्मत, चिकित्सा आकस्मिकता अथवा नया व्यापार उद्यम शुरू करने या खेती करने के लिए अग्रिम हेतु किस प्रकार मुख्य ऋण योजना के अधीन आरएमके से रु०10,000 से रु०35,000 तक का ऋण ले सकती हैं।

    श्रीमती सुभद्रा ने झारखण्ड में राष्ट्रीय महिला कोष के भागीदार एनजीओ- कलामंदिर से सम्पर्क किया। उन्हें घर की मरम्मत के लिए रु०12,000/- तथा पोल्ट्री के लिए रु०10,000/- मंज़ूर किया गया। पोल्ट्री के 300 चूज़े उनकी जीविका की उम्मीद बने। चिकन बेचकर उन्होंने रु०3000/- से रु०5000/- तक प्रति माह कमाया। अब उन्हें किसी के ऊपर निर्भर रहने की ज़रूरत नही है। अब वे आत्मनिर्भर हैं और अपना घर अच्छी तरह से चलाने और अपने बच्चो को शिक्षित करने के लिए अच्छा धन कमा रही हैं। समाज में उनकी हैसियत बढ़ी है। परिवार और समाज में उनकी आवाज़ सुनी जाती है।

    अब, राष्ट्रीय महिला कोष उन्हें परिवर्तनकारी महिला के रूप में देखता है। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था की एसएचजी और आरएमके उनकी ज़िन्दगी में इतना बड़ा बदलाव ला सकता है।

  • किरण बचत समिति हजारीबाग ज़िले के बरही पंचायत समिति के अंतर्गत सिंदपुर गांव की एक (एसएचजी) है, जिसमें 20 महिलाएं हैं। स्थानीय एनजीओ-जन जागरण केंद्र किरण बचत समिति के अपने सदस्यों को आरएमके से सूक्ष्म (अल्प) ऋण देकर उनकी मदद कर रहा है। ग्रुप के सदस्यों को अपनी मासिक आमदनी बढ़ाने के लिए गाय, बकरियां आदि खरीदने के लिए समिति की ओर से ऋण मिलता है। परन्तु एक सदस्य श्रीमती गीता के दिमाग में कुछ और योजना चल रही थी। उन्होंने साईकिल रिपेयर शॉप शुरू करने के लिए एनजीओ के माध्यम से आरएमके से अल्प ऋण के लिए आवेदन किया। इस नवीन और सफल विचार के साथ, श्रीमती गीता देवी ने अपने परिवार की आर्थिक स्थिति में बड़ी हैसियत अर्जित की है । परिवार की निर्णयन प्रक्रिया में उनकी बात को महत्व दिया जाता है। अल्प ऋण मदद से श्रीमती गीता देवी को मान सम्मान और आत्मनिर्भर जीवन जीने का अवसर प्राप्त हुआ है।

एमपी राज्य को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन लिमिटेड, भोपाल महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए उनके लिए एसएचजी बनाकर कार्य कर रहा है। फेडरेशन में कई एसएचजीज़ हैं। डेयरी फेडरेशन को अपने सदस्यों के लिए आरएमके से अल्प ऋण सहायता प्राप्त हुआ है। फेडरेशन से जुड़े सभी सदस्यों को न सिर्फ वित्तीय सहायता मिली है, बल्कि उन्हें उनके क्षमता निर्माण के लिए प्रशिक्षण भी मिला है। श्रीमती बसंता मनोहर फेडरेशन से जुड़े लव कुश महिला स्वयं सहायता समूह की एक सदस्य हैं। वे एक गरीब परिवार की हैं। समूह ज्वाइन करने से पहले अपने बड़े परिवार का भरण पोषण करना उनके लिए बहुत कठिन था। समूह के माध्यम से उन्हें अच्छे नस्ल की गाय खरीदने के लिए आरएमके से वित्तीय सहायता प्राप्त हुई। यह गाय प्रतिदिन 10 लीटर दूध देती है। वे दुग्ध समिति को दूध बेचकर अच्छा पैसा कमाती हैं। सभी खर्चों को पूरा करने के बाद उन्हें रु०1500/- से रु०1600/- तक प्रति माह की नियमित आमदनी प्राप्त हो रही है। इस आमदनी से समाज में उन्हें इज़्ज़त से जीने का अवसर मिला है। वे अपनी बेटी की शादी के लिए बेहतर व्यवस्था कर सकी हैं और अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे पायी हैं। यदि वे स्वयं सहायता समूह की सदस्य न बनी होतीं तो ये सब सम्भव नहीं हो पाता। उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल में भर्ती कराया है। अल्प ऋण सहायता ने श्रीमती बसन्ता मनोहर को आत्मसम्मान की ज़िन्दगी जीने में मदद की है। श्रीमती बसन्ता मनोहर कहती हैं कि उनके जीवन में यह बदलाव नहीं आ पाता यदि आरएमके से वित्तीय सहायता न मिली होती।

इसी प्रकार श्रीमती ममता सुभाष, जो एक तलाकशुदा स्त्री हैं, जय योगेश्वर स्वयं सहायता समूह की सदस्य हैं। वे एक गरीब खेतिहर मज़दूर परिवार से ताल्लुक रखती हैं। वे बड़ी गरीबी का जीवन बिता रही थीं। वे और उनके समूह के कुछ और सदस्यों ने इंदौर दुग्ध फेडरेशन के माध्यम से अल्प ऋण सहायता के लिए आरएमके से सम्पर्क किया। अपने समूह के माध्यम से उन्हें भैंस खरीदने के लिए आरएमके से अल्प ऋण सहायता प्राप्त हुई। उन्होंने को-ऑपरेटिव दुग्ध सोसाइटी, इंदौर को दूध बेचना शुरू किया। उन्होंने ऋण वापस कर दिया है और अब लगभग रु०2000/- मासिक कमा रही हैं, जो कि समाज में इज़्ज़त के साथ अच्छी ज़िन्दगी बिताने के लिए पर्याप्त है। वे अल्प ऋण सहायता के लिए को-ऑपरेटिव दुग्ध सोसाइटी, इंदौर और आरएमके को धन्यवाद देती हैं ।

एक और उदहारण जय दुर्गा स्वयं सहायता समूह का है, जिसमें 20 सदस्य हैं जो दुग्ध सहकारी समिति,मार्या भिलाई से जुड़े हैं। इस समूह को दुधारू पशु खरीदने के लिए आरएमके से अल्प ऋण प्राप्त हुआ। समूह को ज्वाइन करने से पहले महिला सदस्य मज़दूर के रूप में काम करती थीं और बड़ी गरीबी की ज़िन्दगी गुज़ार रही थीं। आरएमके से अल्प ऋण प्राप्त करने के बाद इन समर्पित महिलाओं ने गाय/भैंसे खरीदीं और समिति को दूध बेचना शुरू किये। उन्हें अच्छा फायदा मिलने लगा जो सदस्यों द्वारा आपस में बांटा जाने लगा। इससे समूह के सदस्यों के बीच दुधारू पशुओं के बेहतर अनुरक्षण के लिए जागरूकता पैदा हुई। इतना ही नहीं, इन महिलाओं ने अन्य महिलाओं को गाय बेचना शुरू किया और इससे समूह को अच्छा फायदा मिलने लगा। अल्प ऋण सहायता से समाज में उन्हें इज़्ज़त से जीने का अवसर मिला है। समूह की महिलाएं युक्तिसंगत ब्याज दर पर अल्प ऋण सहायता प्रदान करने के लिए आरएमके की आभारी हैं।

आल बैकवर्ड क्लासेज एन्ड इकनोमिक डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (ए बी सी ई डी ओ), समाराम बाजार, थौबल डिस्ट्रिक्ट, मणिपुर स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से अनेक समाजिक-आर्थिक विकास कार्यक्रम क्रियान्वित कर रहा है। इस संगठन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि आरएमके द्वारा समर्थित इसका अल्प ऋण कार्यक्रम है। इस संगठन के पास 64 महिला स्वयं सहायता समूह हैं। अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए कुछ समूहों ने सब्ज़ी उगाना शुरू किया है। इन स्वयं सहायता समूहों के कुछ सदस्यों ने रु०40,000/- में 2 हेक्टयर ज़मीन पट्टे पर लिया और उसमें 50 हज़ार पत्ता गोभी और कुछ अन्य मौसमी सब्ज़ियों के पौधे लगाए। रु०40,000/- के निवेश ने उन्हें रु०2,39,000/- का फायदा पहुंचाया। इससे उन्हें कृषि में और अधिक निवेश करने का प्रोत्साहन मिला जैसे ट्रैक्टर खरीदना आदि। इसके अतिरिक्त समूह के अन्य सदस्यों को स्वयं सहायता समूह ज्वाइन करने की प्रेरणा मिली ताकि वे भी आर्थिक रूप से मज़बूत और आत्मनिर्भर बन सकें।

एलयूपीआईएन(लूपिन) ह्यूमन वेलफेयर एंड रिसर्च फाउंडेशन, जो एक ज़मीनी स्तर का गैर सरकारी संगठन है, अपने आर्थिक विकास के लिए कुछ चुने हुए गांवों में काम कर रहा है। भरतपुर ज़िले के काम ब्लॉक में नगला हरचंद उनमें से एक गांव है। इस गांव में रहने वाले सामान्यतः कृषि मज़दूर हैं। वे न सिर्फ पिछड़े हैं, बल्कि बहुत गरीब हैं। इस एनजीओ द्वारा पुरुषों और महिलाओं के लिए अनेक स्वयं सहायता समूह बनाये गए हैं। महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक उत्साही हैं। इसलिए विभिन्न समूहों को बनाने में उन्होंने सक्रिय रूप से भाग लिया है। विभिन्न ट्रेडों के लिए एनजीओ द्वारा समूहों को समुचित प्रशिक्षण दिया गया। महिलाओं ने तुलसी माला बनाने और पशुपालन को अधिक प्राथमिकता दी। स्थानीय एनजीओ के माध्यम से अल्प ऋण सहायता के लिए आरएमके से सम्पर्क किया गया। एनजीओ के माध्यम से आरएमके द्वारा इन समूहों को ऋण दिया गया। माला बनाने का व्यापार चल पड़ा और इसकी बिक्री बढ़ गई। इसी प्रकार दूध की बिक्री से आमदनी भी बढ़ी। गांव की आर्थिक हालत में काफी हद तक सुधार हुआ। गांव की महिलाओं ने विकास की मुख्य धारा को ज्वाइन किया। इससे ग्रामीणों के शैक्षिक स्तर में सुधार लाने में मदद मिली। गांव के पिछड़े होने के कारण जो बुराइयां थीं, उनमें उल्लेखनीय रूप से कमी आई और गांव ने अपना पूर्ण आर्थिक विकास अर्जित किया। एनजीओ/एलयूपीआईएन(लूपिन) ह्यूमन वेलफेयर एंड रिसर्च फाउंडेशन के माध्यम से स्वयं सहायता समूह के सदस्यों को आरएमके द्वारा दिए गए अल्प ऋण सहायता से गांव का हरसंभव आर्थिक और सामाजिक विकास सम्भव हुआ।

लल्ला का पुरवा ब्लॉक सोहावल, ज़िला फैज़ाबाद, यूपी की श्रीमती कृष्णा देवी बहुत गरीब परिवार से हैं। उनके परिवार में 4 सदस्य हैं लेकिन उनका घर मुख्य गांव से कुछ दूरी पर स्थित है इसलिए वे पहले किसी भी एसएचजी से परिचित नहीं थीं। फिलहाल, एक बार उन्हें एसएचजी और अल्प ऋण सहायता के लाभों के बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने समूह ज्वाइन कर लिया। उन्होंने उस इलाके में काम करने वाले ज़मीनी स्तर के एनजीओ और आरएमके के एनजीओ भागीदार-पीएएनआई (पानी) से अल्प ऋण सहायता के लिए सम्पर्क किया और उन्हें यह ऋण मंज़ूर हो गया। इस ऋण से उन्होंने एक सिलाई मशीन खरीदी। एक दर्ज़ी होने के नाते उनके पति उनकी जगह काम कर सकते थे। धीरे धीरे उन्होंने अपनी गतिविधियां बढ़ाई और अधिक उन्नत सिलाई मशीनें खरीदी। इससे उनकी मासिक आमदनी बढ़ गई। उन्होंने फिर पीएएनआई के माध्यम से आरएमके से ऋण लिया। उन्होंने अपने व्यापार का रुख बदला और दर्ज़ी की दुकान से इलेक्ट्रॉनिक सामान की दुकान शुरू की। इस विभिन्नता से उन्हें और बड़ी दुकान और व्यापार शुरू करने का साहस मिला। अब वे इलेक्ट्रॉनिक सामान की दुकान चला रही हैं। उनकी मासिक आमदनी बढ़ गई है। उनका जीवन स्तर भी बढ़ गया है। वे अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में भेजती हैं और आत्मसम्मान की ज़िन्दगी बिता रही हैं। उनके पति उन्हें पूरा समर्थन देते हैं और उन्हें ज़िन्दगी में बराबर का हिस्सेदार समझते हैं। इससे उन्हें बहुत सन्तोष मिलता है। उनको अल्प ऋण सहायता देकर उनकी ज़िन्दगी सुखद बनाने के सारा श्रेय आरएमके को जाता है।

महिला विकास संगठन (डब्लूडीओ) वर्ष 1990 से सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1860 के अंतर्गत एक पंजीकृत संगठन है। डब्लूडीओ ग्रामीण महिलाओं द्वारा उत्पादित/निर्मित उत्पादों के विपणन के लिए एक शीर्षस्थ निकाय के रूप में कार्य कर रहा है। डब्लूडीओ 4-टियर प्रणाली के साथ कार्य कर रहा है अर्थात अखिल भारतीय स्तर पर डब्लूडीओ मुख्यालय - राज्य परियोजना कार्यालय - ज़मीनी स्तर पर सम्बंधित पंजीकृत सोसाइटीज और स्वयं सहायता समूह।

सामान्यतः स्वयं सहायता समूहों (एसएचजीज़) में 10 से 20 सदस्य होते हैं। परन्तु जहां डब्ल्यूडीओ काम कर रहा है, उस क्षेत्र में बड़े समूह का गठन कठिन है। इसलिए डब्ल्यूडीओ द्वारा गठित एसएचजीज़ में ग्राम, सुदूर और पिछड़े क्षेत्र में ज़मीनी स्तर पर 5 से 15 सदस्य ही होते हैं। ऊनी एवं सूती वस्तुओं के लिए उपलब्ध प्रशिक्षण के अतिरिक्त क्षमता निर्माण के लिए आवश्यक प्रशिक्षण प्रदान करने के बाद इन समूहों को प्रेरित (मोबिलाइज) किया जाता है। डब्ल्यूडीओ ने बैरक कम्बल बनाने के लिए 15 सदस्यों वाले 10 समूह गठित किये। इस प्रकार बैरक कम्बल बनाने के लिए 150 सदस्यों का समूह बनाया गया। विभिन्न गाँवो में इन समूहों से जुड़े 450 पारिवारिक सदस्य हैं। इस तरह पारंपरिक बुनकर परिवारों के 600 सदस्य सहयोजित किये गए। इसी प्रकार डब्ल्यूडीओ द्वारा 15 सदस्यों वाले 20 समूह गठित किये गए जिसमें कुल 300 महिला सदस्य हैं। इन समूहों में पारंपरिक बुनकर परिवारों के 900 सदस्यों को सहयोजित किया गया। इस प्रकार डब्ल्यूडीओ अपने स्वयं सहायता समूहों में 1200 अतिरिक्त परिवारों/सदस्यों को जोड़ सका। बाद के वर्षों में 15 सदस्यों वाले 20 अन्य समूह बनाये गए। इन समूहों ने एक महासंघ (फेडरेशन) बनाने के लिए अपने समूहों में से 10 सदस्यों को नामित किये और इसे सोसाइटी में पंजीकृत किये। ये सभी 50 एसएचजीज़, जिनमें अप्रत्यक्ष रूप से 900 परिवार जुड़े हैं, महासंघ (फेडरेशन) के सदस्य बन गए, ताकि सभी 3000 सदस्य संयुक्त रूप से अपनी सुविधा के अनुसार कार्य कर सकें। शुरू में, डब्ल्यूडीओ के प्रतिनिधि अर्थात सचिव ने उस महासंघ का मार्गदर्शन किया जब तक कि यह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर नहीं हो गया।

  • यह कहानी तमिलनाडु के पलापट्टी पंचायत के अधीन उसिलमपट्टी गांव की है। यह सूखे वाला गांव भी है। इस गांव के निवासी मुथुराजा जाति के, अत्यंत पिछड़े और गरीब हैं। गांव लिंगाधारित हैं और इसलिए यहां महिलाओं की दशा दयनीय है। फिलहाल, आरएमके के एक ज़मीनी स्तर के भागीदार- द सोसाइटी फॉर डेवलपमेंट ऑफ़ ह्यूमन एबिलिटीज एंड एनवायरनमेंट (ओएजेडओएनई) ने कर्ज़दाताओं के चंगुल से ग्रामवासियों को बचाने के उद्द्येश्य से स्वयं सहायता समूहों (एसएचजीज़) का गठन आरम्भ किया। 30 महिलाओं का एक समूह बनाया गया और उन्हें रस्सी बनाने का प्रशिक्षण किया गया। रस्सी बनाना उनका पारम्परिक व्यवसाय था। रस्सी बनाने के लिए आगावे नामक एक पौधे की पत्तियां कच्चे माल के रूप में प्रयोग की जाती हैं। यह पौधा सूखे वाले क्षेत्रों और ऊसर क्षेत्रों में पाया जाता है। इसलिए रस्सी बनाने के लिए कुछ महिलाओं ने आगावे की पत्तियों की खेती शुरू की। एसएचजीज़ ज्वाइन करने से पूर्व ये महिलाएं अपना उत्पाद बिचौलियों को बेचती थीं, जो उन्हें कम दाम देता था और कुछ राशि जमा के रूप में अपने पास रखता था। इन महिलाओं की हालत में सुधार नहीं हुआ। फिलहाल,एसएचजीज़ ज्वाइन करने के बाद वे एनजीओ- ओएजेडओएनई के माध्यम से आरएमके से सूक्ष्म ऋण सहायता पा सकीं। इस ऋण से उन्होंने अपने उत्पादों के उत्पादन और विपणन गतिविधियों की देखरेख करने के लिए उत्पादक कोऑपरेटिव शुरू किया। सूक्ष्म ऋण सहायता ने उन्हें कच्चा माल प्राप्त करने में मदद की। अब वे बिचौलियों के चंगुल से बाहर हैं और अपने उत्पादों के लिए अच्छा दाम पाने की स्थिति में हैं। प्रतिदिन उन्हें रु०100/- से रु०150/- तक की नियमित आमदनी हो रही है। नियमित आमदनी से उनका जीवन स्तर, सामाजिक स्थिति बेहतर हो गई है और पारिवारिक मामलों में उनकी बात का महत्व बढ़ गया है।
  • मधर नाला थोन्दु निरुवनं (एमएनटीएन) नामक एक ज़मीनी स्तर के गैर सरकारी संगठन ने अनेक स्वयं सहायता समूह बनाये। उनमें से एक स्वयं सहायता समूह का नाम सूर्य स्वयं सहायता समूह है, जिसमें 15 सदस्य हैं। स्वयं सहायता समूह ज्वाइन करने से पूर्व समूह के सदस्यों की आर्थिक हालत बहुत खराब थी। एमएनटीएन द्वारा आय सृजन कार्यक्रम के लिए समूह को प्रशिक्षण दिया गया। समुचित प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद एमएनटीएन ने समूह के लिए अल्प ऋण सहायता हेतु आरएमके से सम्पर्क किया। स्वयं सहायता समूह को दुग्ध डेयरी व्यापार के लिए एक ऋण मंज़ूर किया गया। इस व्यापार से उन्हें पर्याप्त लाभ हुआ। यह लाभ समूह के सदस्यों के बीच बांटा जाता है। इससे उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ और समाज में उनका सम्मान बढ़ा। इससे उन्हें अपने बच्चों को शिक्षित करने और आत्म सम्मान एवं प्रतिष्ठा का जीवन जीने का अवसर मिला। समूह की सफलता से प्रोत्साहित होकर उस क्षेत्र की अन्य महिलाओं ने अपने स्वयं सहायता समूह के लिए इस मॉडल का अनुसरण किया। समूह के सदस्य एनजीओ के माध्यम से आरएमके द्वारा दिए गए वित्तीय सहायता के लिए इसकी सराहना करते हैं।
  • त्रिचिरापल्ली ज़िले के थावलिवेरणपट्टी गांव के दो स्वयं सहायता समूहों, जिनमें 26 सदस्य थे, ने ज़मीनी स्तर के एनजीओज़ के माध्यम से राष्ट्रीय महिला कोष (आरएमके) से ऋण लेने के बाद एक डेयरी यूनिट शुरू की। इन समूहों में अधिकांशतः दलित और पिछड़ी जातियों के लोग थे। प्रारम्भ में यह यूनिट रु०76,000/- की ऋण सहायता से शुरू की गई थी, बाद में इस यूनिट को विकसित करने के लिए रु० 2.99 लाख प्रति समूह की ऋण सहायता प्रदान की गई। यूनिट का उत्पादन बढ़कर 200 लीटर दूध प्रति दिन हो गया। उत्पादन में बढ़ोत्तरी से समूह के सभी सदस्यों की ज़िन्दगी में तरक्की हो सकी है। यूनिट का प्रबंध करने, सदस्यों से दूध इकट्ठा करने और यूनिट का लेखा कार्य करने के लिए यूनिट द्वारा 3 अतिरिक्त महिलाओं को रोज़गार दिया गया है। यूनिट का लाभ 25 % से अधिक है। यूनिट की तेज़ प्रगति को ध्यान में रखते हुए महिलाओं ने अपने खेतों में चारा और पेड़ उगाना शुरू किया है। यह कहा जाता है कि इन महिलाओं द्वारा की गई प्रगति हर प्रकार से पुरुषों की तुलना में बेहतर है। इस प्रगति ने महिलाओं को पशुओं के चारे की मिक्सिंग यूनिट और कृत्रिम गर्भाधान केंद्र शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया है। समूह के सदस्य अपना दूध डेरी को ऑपरेटिव के माध्यम से बेच रहे हैं परंतु बेहतर कीमत और लाभ प्राप्त करने के लिए वे बाजार में सीधे जाने के बारे में सोच रहे हैं।
  • यह कहानी श्रीमती रोशनारा हलदर पत्नी श्री अबू सिद्दीक हलदर, गांव- निजउत्तरपारा, थाना- जयनगर, ज़िला दक्षिण 24 परगना, पश्चिम बंगाल की है, जो कि मानव विकास केंद्र (एचडीसी) द्वारा बनाये गए स्वयं सहायता समूह की सदस्य हैँ। एचडीसी आरएमके का एक ज़मीनी स्तर का भागीदार है। श्रीमती हलदर एक बहुत गरीब परिवार की हैँ। नियमित आमदनी न होने के कारण परिवार बहुत परेशानी में था और उसके लिए जीवन यापन करना बहुत कठिन था। परिवार में पति, पत्नी और 2 बच्चे थे।
    श्रीमती रोशनारा हलदर को अपने पड़ोसियों से एचडीसी स्वयं सहायता समूह के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने एक समूह ज्वाइन किया। एचडीसी ने आरएमके से ऋण के लिए आवेदन किया। आरएमके से प्राप्त अल्प ऋण सहायता से श्रीमती हलदर को रु०3,000/- का ऋण मिला। उन्होंने अपने घर के बगल में चाय की एक दुकान खोली। धीरे धीरे एचडीसी की नियमित मदद से उन्होंने अपने व्यापार को बढ़ाया। समय के साथ उनकी वित्तीय आमदनी में बढ़ोत्तरी हुई। इससे उन्हें अपने बच्चों को शिक्षित करने में मदद मिली। अब उनके बच्चे स्कूल में पढ़ रहे हैँ। टी स्टाल के अतिरिक्त अब उन्होंने एक मीट शॉप भी खोल ली है। इससे उनकी आमदनी बढ़कर रु०8,000/- प्रति माह से भी अधिक हो गई है। अब उनके परिवार में कोई परेशानी नहीं है और वह परिवार खुश है। यह आरएमके से प्राप्त अल्प ऋण सहायता से हुआ है।
    श्रीमती यशोदा घोष के परिवार में 6 सदस्य हैं। उनके पति की कुल सालाना आमदनी दूध बेचकर रु०10,000 थी। यह आमदनी अच्छी ज़िन्दगी विताने के लिए पर्याप्त नही थी। पूंजी न होने के कारण परिवार दूध का व्यापार भी नहीं बढ़ा सकता था। श्रीमती यशोदा ने बंधन एनजीओ द्वारा बनाये गए एसएचजी को ज्वाइन किया।
  • एनजीओ के माध्यम से आरएमके से प्राप्त अल्प ऋण सहायता से उन्हें एक गाय खरीदने और अपना व्यापार बढ़ाने में मदद मिली। उनकी मासिक आमदनी बढ़ी। एनजीओ के माध्यम से आरएमके द्वारा प्रदत्त सहायता से स्वयं सहायता समूह के सदस्यों को कमाने और लगभग रु०300/- महीना बचाने में मदद मिली। परिणामस्वरूप, श्रीमती यशोदा की सामाजिक-आर्थिक हैसियत बढ़ गई और वे आत्मनिर्भर हो गयीं। इस आर्थिक उन्नति से वे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा और चिकित्सा सुविधा दे पा रही हैँ। उनकी सफलता से गांव की दूसरी महिलाएं भी प्रोत्साहित हुई हैँ और उन्होंने दूसरा एसएचजी बनाया है।

सूचना पट्ट

चर्चा में

  • आरएमके और महिला ई-हाट के नेटवर्क के विस्तार के लिए आउटरीच कमेटी का गठन   और उनकी क्षमता-निर्माण योग्यता।
  • आरएमके का पुनरीक्षित ऋण दिशा निर्देश
  • एनजीओ दर्पण पोर्टल
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